FOG: धुंध जो हटती नहीं

Do you put on spectacles ? If yes, you can understand my pain when I encountered with fog. Actually, we find fog at winter where the pollution has crossed its danger level. But for the people like me, it brings some more problem and makes me think about life. As you know when there is no visual in your surroundings, your brain starts seeing things differently. Usually people call it imagination and waste of time. But I just enjoy it without concerning. Foggy is the best time for me to loss in other world and try to find out other version of mine.  Here I am talking about the uncertainty of my life by using fog as a prop.

 

 

पहले तो ये धुंध काफी घना है

ऊपर से मेरा चश्मा भी भाप से सना है

 

अब तो न नज़र है न नज़ारे

बस अन्दाज़े से यूँही जिन्दगी की सड़क पे चल रहा हूँ

इस बात से बेखबर कि मुसीबतों की गाड़ियां मेरी तरफ दौड़ी चली आरही हैं .

 

कुछ ज़िम्मेदार मुसीबतें हेडलाइट जलाकर मुझे संभलने का इशारा कर रही हैं

पर कुछ बेशर्म मुसीबतों ने मुझे धप्पा करने की ठान रखी है ..

 

इन धप्पों से बचते – बचाते …  मैं
अपने ही कुछ सवालों से टकरा गया…

सदमे के इस बिस्तर पर लेटे-लेटे सोच रहा हूँ…

 

ये धुंध तो छट जाएगी जब फलक पे सूरज आएगा..

भाप तो हट जाएगी जब कोई सूखा कपडा लग जायेगा…

 

पर कौन सा सूरज मेरे मन की धुंध छटायेगा…

कौन सा कपडा मन्ज़िल पे मेरी नज़र को चमकाएगा…

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