Survival of the Fittest | Hindi Poem

Survival of the Fittest | Hindi Poem

Survival for the fittest is a terminology frequently used in the corporate world. Most of the things are so fake in this world. Inaptness is hiding behind fancy words. I can’t be true for every corporate but where are the labor laws then. No rule is clear. That compels the good minds to enter in dirty politics and leave themselves unskilled. Yes, again I am not right for everyone but right for most of them. So much burden of such unworthy works.

Hindi Poems

Survival for the fittest: Hindi Poem

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CONCRETE के इस जंगल में भी,

SURVIVAL OF THE FITTEST की दौड़ है,

भूखे इतने कि,

JOB और छूटी खाने की बस हौड़ है।

 

इस दौड़ में कहीं पिछड़ न जायेँ , क्यूँकि जूता चाटना हमें आता नहीं,

काम कुछ भी नहीं हो पर काम कर रहा हूँ,

ये दिखाना हमें आता नहीं।

 

MAIL- वेल सब झोल है, पढ़ता- वढ़ता कोई नहीं

POLITICS जो यहाँ का FAMOUS खेल है।

 

अपना काम किसपे डालूं ,

गलती हुई तो बिल किस पे फाड़ूं,

 

किसको डुंडू , किसके दाँत तोड़ूँ।

अ- अरे दाँतों  से नहीं कानाफूसी  से ज़हर है यहाँ उगले जाते

 

तो संभल के चलना यारों, इस जंगल में साँफ भी हैं बस्ते

मीठी- मीठी बातों से HYPNOTISE कर, बड़े प्यार से हैं डसते।

 

बन्धुआ मजदूरों की कहानी आज भी उतनी सच्ची है,

पर जानवर नहीं अब मशीन है समझा जाता,

बस इतनी सी बात अच्छी है।

 

उल्लू सी ऑंखें बड़ी कर, WINDOWS में नज़रे गढ़ा के रखते हैं

खाली हैं कन्धे, पर दिमाग में न जाने कौन सा बोझ,

गधों की तरह उठा कर चलते हैं।

 

इस दौड़ में केवल उँगलियाँ ही दौड़ रही,

दौड़ भी रहीं हैं कुछ ऐसे

की पहुँच  कहीं  भी नहीं रही।

 

SURVIVAL OF THE FITTEST की दौड़ में,

जानवर जो इंसान हुआ,

CONCRETE के इस जंगल की दौड़ में वही इंसान,

जानवर फिर से बनता जा रहा।

 

 

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