Suicide: End of All Hopes

Suicide: End of All Hopes is a Hindi poem which expose the darkest part of that person who is feeling to commit suicide. There can be many reasons for that. In India mostly students and farmers feel this darkest part. They take every positive things in negative sense. At that time postivity of life (The light) pains the person, nothing seems clear to him, he cann’t decide where to go, who is going to help. You can say that he is traped in the box of positivity but doesn’t find anythin worth.  He embrasses death (Darkness) over positivity of life (Light).

Hindi:

जीवन ये कैसा उजाला, साफ़ जिसमे कुछ भी नहीं 

मौत ये कैसा अँधेरा, जिसमे केवल है अँधेरा और कुछ बिल्कुल नहीं। 

 

ये उजाला चुभ रहा है, दिखता जिसमें कुछ भी नहीं 

इससे अच्छा उस अँधेरे की आहोश में, मैं खो जाऊँ।

 

“हाँ उजाला चीरता है, अँधकार को एक किरण से 

पर किसी ने न बताया, चीर जाता है ह्रदय भी,

 अगर उजाला तुम रहे हो किसी की उम्मीदों का “

“ये उजाला क्यों पड़ा है पीछे मेरी जान के 

मारकर ही दम लेगा क्या, मुझको मेरे नाम से। “

 

“सुनता था बचपन से ही 

रोशन करेगा चिराग,

 हाँ कुलदीपक हूँ मैं। 

रोशनी का तो पता नहीं पर चिराग तले अँधेरे से जुड़ने लगा हूँ मैं। “

 

इस उजाले की चौँध में, भविष्य मुझे दीखता नहीं,

मेरी मेहनत का फल मुझे, पता नहीं क्यों अब मिलता नहीं। 

A farmer: Suicide: End of All Hopes

“मेरा ही पसीना गूँधता है मिट्टी को पूरा भीगोकर 

सौंधी सी खुशबू, तब तुम्हें, उस गांव की याद दिला आती है 

लहलहाती हैं फसलें, मेरी ही एक छुअन से 

नाच उठती है, ख़ुशी से, मेरी मेहनत और सिद्धत से 

पर ये मेहनत क्यों फेंकी है, सड़को पे, इन राहों पे 

क्या इस सिद्दत का यहाँ, कोई अब मोल है नहीं “

ये उजागर जब हुआ, तो अब पेड़ से लटका हूँ मैं 

बैल भी सोचते होंगे मेरे क्या नया दुलार कर रहा हूँ मैं 

क्या पता उन मासूमों को खुदकुशी कर रहा हूँ मैं। 

 

ये उजाला चुभ रहा है, दिखता जिसमें कुछ भी नहीं 

इससे अच्छा उस अँधेरे की आहोश में, मैं खो जाऊँ। 

A Student: Suicide: End of All Hopes

ये उजाला निगल गया किसी और घर के चिराग़ को 

माँगता था बस मार्गदर्शन, बेरोज़गारी  अपनी मिटाने को 

 

दे भी देता उंगूठा दान में, ऐसा था वो विद्यार्थी,

पर मार्ग दिखाने को कोई, द्रोण उसे मिला कभी मिला नहीं 

स्वपन था बनना श्रवण कुमार, बस स्वप्न ही रह गया 

और बूढ़े कन्धो की मजबूती भी तब फिर हमे दिखने लगी 

जब विद्यार्थी की अर्थी लिए, एक बाप चल दिया। 

 

ये उजाला चुभ रहा है, दिखता जिसमें कुछ भी नहीं 

इससे अच्छा उस अँधेरे की आहोश में, मैं खो जाऊँ। 

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