Rakshabandhan: A Freedom in culture

Rakshabandhan is one of the auspicious festivals of India. Raksha means to protection and Bandhan means thread. Though it is known as a brother-sister relation, it is more than that. History shows the significance of this festival and proves it to be a cultural festival rather than a religious festival. We always cry out for freedom, space, and other fancy terms but never talk about discipline, values, commitment, Bandhan, in a relation. But true freedom lies in bandhan in many cases.

Rakshabandhan is that Bandhan which makes freedom a worth of celebrating. But how many of us know the reason behind celebrating the festival. Without knowing the real meaning of celebrating or the essence of celebration is just like following the something blindly. Here are some of my creation of 2019 where Rakshabandhan and Independence day is placed on the same day.

Reference is taken from the history of India when Alexander marched to conquer India but defeated. Not just only defeated but blessed with life because his wife tied Rakhi to king Puru.

Nazeer Akharabadi a famous poet wanted to be a Branhmin sorrounded by people to tie the rakhi to them. It is a lesson from the past we should learn today when we are trying to limit Rakshabandan to a particular sect of society.

 

HINDI: Rakshabandhan

” कुछ तो इशारा है, इन फ़िज़ाओं में कि,

रक्षाबंधन का त्यौहार, स्वतंत्रता दिवस के साथ आया है।”

 

“चलो इतिहास उठाते हैं,  जीवन के पन्ने पीछे की तरफ पलटते हैं, 

बचपन में था जो कुछ पढ़ा, नहीं- नहीं बचपन में था जो कुछ सीखा, उसे फिर से दोहराते हैं।”

 

FESTIVALS:

त्यौहारों  का महत्व आज उतना है, जितना पहले कभी भी नहीं था। 

भागती- दौड़ती, रेलगाड़ी की तरह होगयी इस जिंदगी में त्यौहार स्टेशन की तरह आते हैं। 

थोड़ी देर रुककर, खुशियां मनाकर, सोच विचारकर फिर से नयी उमंग के  साथ सफर शुरू करने का स्टेशन। 

 

मायनों से हम भटक तो नहीं गए हैं, माना ये सफर कई बार हमे तोड़ता है, माना कई बार हमे समझौता करना पड़ता है। 

पर हम भी तो कर्ण, अभिमन्यु की कहानियाँ पढ़कर बड़े हुए हैं,

इन परिस्तिथियों को झुकाकर ही दम लेंगे पर मायनों से भटकेंगे नहीं जो इस संस्कृति ने हमें दियें हैं।  

HISTORY: Rakshabandhan

“सुनी तो होगी ख्याति, उस विश्वविजेता सिकन्दर की 

जीतने आया था आजादी मेरे देश हिन्दुस्तान की 

हाँ जीता था 

पर ‘प्राणदान’ राखी के उस बंधन से,

बांध गयी थी उसकी पत्नी, जो  पुरू की लौह कलाई पे। “

 

ये संस्कृति है इस देश की, 

कि छोड़ दिया अपनी आज़ादी के दुश्मन को 

एक कच्चे धागे के लिए। 

 

सोचें कि मिलता है क्या आज भी ऐसा मिश्रण आज़ादी, सहिंष्णुता, और राखी का 

जो सब मिलके बनती हैं मूल,  इस भारतीय संस्कृति का ? 

LINERS:

“क्या बाँधेगा कोई इस देश की संस्कृति की आज़ादी को, अपनी छोटी सोच से? 

पूछोगे तो, 

मिलता रहेगा जवाब, नज़ीर अक़बराबादी की नज्म से “

NAZEER:

ख़्वाहिश है ब्राह्मण बन राखी बँधवाने की।

वो बैठे रहे और लोग धागा लिए उन्हें घेर कर राखी बांधने की प्रतीक्षा करें। 

 

“घिरा तो रहता है कोई नज़ीर आज भी भीड़ में,

 पर डंडे और तलवारों से 

पता नहीं कब, वो इंसान से, दूसरे दिन अख़बार की ख़बर बन जाता है। “

 

“अरे कोई तो पकड़वा दो भीड़ को, राखी का धागा,

सुना है संस्कृति कुछ टूट सी रही है।”

Rakshabandhan: CULTURE BEYOND RELIGON

हाँ ये कच्चा धागा, भाई- बहन का ही नहीं 

हर उस रिश्ते का रक्षाकवच है, जो इस देश की संस्कृति को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। 

ये संस्कृति मज़हब नहीं देखती, दूसरी संस्कृति को भाँहे फैलाकर स्वागत  करती है। 

 

यकीन नहीं तो रानी कर्णावती की कहानी सुनलेना। 

बहादुर शाह से अपने राज्य की रक्षा के लिए, हुमायूँ को ये धागा भेजा था। 

और हुमायूँ भी दौड़ा चला आया केवल रानी को बचाने के लिए नहीं बल्कि इस देश की संस्कृति के लिए भी। 

राजपूत भी पीछे नहीं रहें हैं, मुस्लिम औरतों को कट्टर पंतियोँ से रक्षा करने में। 

माना स्वम्भू इतिहासकार मुँह  फेर दें पर राजस्थानी लोक गीत, संस्कृति की ये कथाएं गाते रहेंगे। 

 

“कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा : इकबाल” 

बचपन में पड़ा था, नहीं- नहीं बचपन में सीखा था, बस अब दोहराते रहना है। 

हैं न ?

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