Pataal Waale Gharon Ki Diwali: Hindi Poem

Pataal Waale Gharon Ki Diwali: Hindi Poem

Pataal Waale Gharon Ki Diwali is a Hindi Poem on Pahadi ghar by Kagaj kalam that are abandoned now. Actually, pataal waale ghar are not much demanding they need nothing but the love of their own. They are still watching their owns  way to come back home.

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Pataal Waale Gharon Ki Diwali:

पहाड़ों के पटाल वाले घर may be old fashioned in the race of modernism but we all have enjoyed its company whoever are belongs to them. 

Watch it PahadNama

वो पहाड़ों के पटाल वाले घर याद हैं न

न जाने उन बदक़िस्मतों की दिवाली आएगी तो आएगी कब।

 

बस कुछ ही दीये लगते और वो जगमगा जातें हैं

दो- चार बात करने वाले मिल जायें तो चहल-पहल से खिल जातें हैं

 

सुने पड़े वो अँधेरे घर आज भी

अपने कुल दीपकों की राह  ताकतें हैं

 

दो दिनों के लिए आये तो  उनकों फिर से अपना

और दिनों को त्यौहार समझ लेते हैं।

 

शिकायतें पुरे साल की बस उन दो दिनों के लिए भूल जाते हैं।

बेचारे अपना सूनापन मिटाने के लिए दिवाली मानते हैं।

 

”  तो इस दिवाली तुम घर जाओगे न

 

काम बहुत है या गाँव दूर बहुत है

जैसे बहाने बनाओगे तो न

 

अरे उन अँधेरे घरों के चिराग और

किसी की आँखों के दीये हो तुम

 

कहीं उन बूढ़ी आँखों और सुने पड़े घरों को

यूँ ही इन्तज़ार करवाओगे तो न

 

इस दिवाली तुम घर जाओगे तो न “

 

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