Pahadi Culture: A Story Of Identity Crisis

“Pahadi Culture: A Story Of Identity Crisis” is a story of Pahadi culture, foods, arts, stories, and languages. It is a saying if you want to destroy any place destroy its culture. If you want to destroy a culture, destroy its languages, foods, arts, and folklore. Culture is a symbol of someone’s pride which is necessary to live the life with values. Without it, we can face identity crisis. Here, we would love to meet you the lost identity of Pahad. Hope, you will shower love on us.

Pahadi Culture: Pisyun Lun (The Taste Of Pahad)

 

पाँच हज़ार साल पुराना इतिहास है सिलवटे का

हाँ कई मजहबोँ से भी प्राचीन

आज जब इन मजहबों की अधिकतर मान्यतायें बासी हो गयी हैं

तब भी सिलवटे से पीसे लोंण का जायका

जबान पे पुरानी शराब की तरह चढ़ता है

आपको ताज़ा रखता है

 

pahad namak

Pisyun Lun: Swaad Pahad Ka

Sometimes, saying the things indirectly is more effective, wise, crisp, and humble at the same time than saying it directly.

क्योंकि

हर नमक अदा करने के लिए नहीं होता

 

कुछ

केवल चटकारे लगाने के लिए भी होते हैं

 

और हर चटकारे में

84 से भी ज्यादा मिनरल्स

 

जो शायद ही “SO CALLED “देश का नमक

कभी अदा करपाये

 

Uttarakhand Namak

Phadi Foods & Their Identity Crisis:

It is a time when everyone in our country is divided on two parts. First is in the favor of CAA and other is against CAA. Everyone have their point of views which is good but the problem is they are not ready to listen other’s perception. I would love to listen “Pahadi foods’ perception”, if they could have. Here, I have tried to give them voice.

 

आजकल देश में CAA के पक्ष और विपक्ष में

काफी बहस छिड़ी हुयी है,

 

कोई कहता है किये पहचान देने वाला क़ानून है,

कोई कहता है कि पहचान छीनने वाला

 

मैं भी एक आम भारतीय की तरह इस बहस में उलझा हुआ था

और क्यों न उलझूं : क्रिकेट, राम मंदिर, के बाद

अपने बातों की धार और विचारों की जोर अजमाइस का मौका जो मिल गया था । 

 

तभी कुछ पहाड़ी व्यंजनों से मेरी मुलाक़ात होगयी । 

मैंने झटके से बोला: अरे वाह,

कोदे की रोटी, घी, सिलवटे का पिसा लूण, खटाई

और इन सबके बाद बाल मिठाई

।।मजा ही आजायेगा ।

 

इतना सुनते ही ये व्यंजन खुशी से उछल कर मुझसे बात करने लगे:

यकीन नहीं होता आजकल के इस लौंडे ने हमे इतनी आसानी से पहचान लिया।

मैंने कहा: मैं आजकल का लौंडा नहीं हूँ ।

३० साल पुराना आइटम हूँ,

आपकी बदौलत और डाई की मेहरबानी से नया लगता हूँ,

 

और बताओ तो क्या चल रहा है आजकल:
वो बोले: यार सब जगह मैगी चल रहा है ।

हर पहाड़ी रास्ते में बस यही लम्बे- लम्बे केचुएं देखने को मिलते हैं

जिसे देखते ही हर पर्यटक के मुँह में और हमारी आँखों में पानी आजाता है ।

 

पहाड़ों का राज्य भोजन बना बैठा है ।

यार हमारी पहचान के तो CAA लग गए ।

 

हमारे पास कोई पहचान पत्र तो हैं नहीं

लेकिन मैगी के पैकेट को मेड इन इंडिया का तमगा मिला हुआ है ।

“Feeling Like Minority in our own State “

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *