Pahad Mera Ghar: Hindi Kavita

Pahad Mera Ghar is a Hindi Kavita by Kagaj Kalam shows the chatpatahat of going home but don’t find it as expected.

Pahad Mera Ghar: Hindi Kavita

Lesson 1: Present Me 

आंखें सुर्ख, नींद अधूरी जैसे किसी सपने का क़त्ल करके आया हो,

चेहरे पे तल्खियों की सलवटें, बातों में वो चिड़चिड़ापन जैसे खुशियों का गला दबाके आया हो,

पर टीकेँ हैं,

एक दिन घर जाने के ख्वाहिश लिए जिंदगी की कश्मकश में मजबूती से टीकेँ हैं,

Lesson 2: मेरा घर: 

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बंज़र पड़ी मेरी जिंदगी में मुस्कराहट की बून्द है: मेरा घर,

चुराई हुई ककड़ी के ऊपर सिलवटे में पीसे लोणा की याद है: मेरा घर,

पेड़ों में महकते सेब और बुरांश की खुशबू है: मेरा घर,

खटाई से बाल मिटाई का स्वाद है : मेरा घर,

सर्दियों में बर्फ की रजाई सी ओढ़ता है: मेरा घर,

वही तो शांत और खूबशूरत पहाड़ है :मेरा घर।

Pahad Mera Ghar
Pahad Mera Ghar

 

Lesson 3: कायाकल्प : Where is My Home?

पर अब घर है कहाँ ?

ये रास्ते तो परिंदे तक पहचानते नहीं,

इस जगह अब मेरी यादें बसती नहीं ।

फिर से कहीं मैं बेघर तो नहीं ।

Lesson 4: कायाकल्प : 

अरे क्यों जरुरी है सड़क के लिए पेड़ों को काटना,

क्यों जरुरी है शहर में इमारत के लिए

अपने ही यादों के घर को तोडना,

क्यों जरुरी है, गांव का खुला आसमान छोड़

शहरों की बंद गलियों की खाख छानना,

क्यों जरुरी है पहाड़ों की याद लिए

यहाँ घुट- घुट के मरना।

Lesson 5: नासमझ: 

एक शख्स का अक्स मरा है यहाँ अभी,

फिर भी मेरे पहाड़ से लोग चले आरहे है

ये कहकर कि

“कमाता बहुत है “

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