Pahad Ak Sajeev Sanskriti

Pahad ak sajeev Sanskriti is about पहाड (Pahad) which is a vivacious culture not just pile of soil and stones.  The beauty of it is not only be seen but also imbibed. Beauty is not just limited to scenery but extended to people and their behavior, language, simplicity, naive, foods, or their sight to see the world. You will be Pahadi once you lived that life and imbibed it for few months. Watch Video Here.

Pahad ak sajeev Sanskriti

पहाड “ कोई निर्जीव ऊबड़-खाबड़ मिट्टी-पत्थरो का ढेर नहीं, अपने आप में एक सजीव संस्कृति है जिसकी खुबसूरती केवल देखी नहीं बल्कि महसूस भी की जाती है। अक्सर लोग इसकी खुबसूरती में खोकर अपने आप को यहां ढूंढने आते हैं। हमसे मिलते हैं और पहाड़ी करके बुलाते हैं ।

अक्सर हमसे पूछते हैं कैसे रह लेते हो यहां पर, काफी मुश्किल है यहां तो रहना । उन्हें क्या बताएं जटिलता में सरलता हम ऐसे ढुंढ लेते हैं जैसे यहां चटानो के बीच रास्ता ढूंढ लेते हैं “ठडा और मीठा पानी”

तासीर हमारी भी कुछ पानी जैसी है । शांत स्वभाव में मीठी बोली की परत ।युहि  नहीं लोगों का मन मोह लेते हैं । आप भी सोच रहे होंगे ये अतिशयोक्ति तो नहीं ऐसा भी संभव हैं? तो कभी चट्टानों से निकलता ठंडा पानी तो पी कर देखिए । न नियत भरेगी न पेट , अगर एक बार पियोगे , बस पीते रहोगे वो ठंडा पानी , क्यो की पीने से बढ़कर है इसे महसूस करने की प्यास ,

ऐसे ही हम पहाड़ी भी है , हां शर्मीले हैं बिल्कुल अपने हिस्से के सुरज की तरह , जो हर रोज आने जाने वालों को चोटियों के पीछे से देखता और मुस्कराता है । कभी कभी आग बबूला भी हो जाता है “पहाड “इसे बारिश में भीगोने से जरा भी नहीं कतराता।

अपनी ऊंचाईयों से ये बादलो तक को झांक कर देखता है । कई लोगों के सपने होते होंगे बादलों को उछल कर छुने के , पर हम  पहाड़ी पैरों से मार कर बादल उड़ा देते हैं । ये नेमत है उसकी हम पर  कि बादलों पर घर दिया है लोग तो बादलों से उपर स्वर्ग की कल्पना करते हैं पर हम पहाड़ी उनकी कल्पनाओं से ऊपर रहते हैं।

पहाड़ खुबसूरत हैये खुबसूरत रह सकते हैं  बशर्त है इसे तुम खुबसूरत रहने दो।

To know more about pahad, read PahadNama.

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