Kuch Pahad Kandho Par Kuch Bele Pairon Par: A Hindi Poem

Kuch Pahad Kandho Par Kuch Bele Pairon Par: A Hindi Poem. You can find the context of this Hindi poem very easily. It is a story of a lover who is fallen in love with his native land. but is away from it for earning his living necessities. Somehow he manages to come his native place time to time in spite of heavy responsibilities. For some time he spends his life here like a child and return with a promise to come back again. Basically, it is a story about almost half of the Indian population. One of the story that a Pahad wants to tell. We have all the ears to listen him.  To watch 

Kuch Pahad Kandho Par Kuch Bele Pairon Par: A Hindi Poem

In our PahadNama series, we have come up with a new Hindi poem. This shows a native’s desperation to come back his home. That is a common story of almost half of Indians.

कुछ पहाड़ कन्धों पर हैं कुछ बेले पैरों पर ,

कुछ पहाड़ कन्धों पर हैं कुछ बेले पैरों पर ,

और रोकती रहेंगी कुछ कागज़ों की जरूरतें भी,

पर तुझसे मिलने आता रहूँगा मेरे पहाड़,

जानता हूँ अपना तो लेगा ही तू।

 

तू मेरे सपनो को अक्सर जगाता रहा है,

यकीन दिलाता रहा है

बस एक- एक और चोटी चढ़लूँ तो

आसमा तक को भी अपनी मुट्ठी में करलूं।

 

और मैं विज्ञान को नकारकर फिर से बच्चा बन जाता हूँ ,

बिना किसी फ़िक्र के कहीं भी निकल जाता हूँ।

 

हर सपना तब अपनी गिरफ्त में लगता है ,

बस उछलने की देरी है

फिर हर आसमा भी अपनी मुट्ठी में लगता है।

 

तू मुझसे- मुझको कुछ ऐसे मिलाता रहा है

कि आयना देखूं तो मुझमें ” मेरे पहाड़ ” तू ही नज़र आता है।

 

“दृढ़, शांत, चेहरे पे मुस्कान,”

ऐसा तो केवल तू ही तो दीखता है।

 

तुझसे मिलके

अब वो कन्धों के पहाड़ हलके से लगते हैं ,

पैरों की बेलें कुछ ढीली सी लगती हैं ,

कागज़ों की ज़रूरतें, अभी भी है

मगर तुझसे

फिर मिलने की ख्वाहिश से थोड़ा कम ही लगते है।

 

कुछ पहाड़ कन्धों पर हैं कुछ बेले पैरों पर ।।

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