Ghughutiya: Uttarakhand Festival

Ghughutiya: Uttarakhand Festival is one of the most revered festivals in Uttarakhand. It is celebrated mostly in the parts of Kumoan one of the mandal of Uttarakhand.

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Ghughutiya Uttarakhand Festival: Hindi Kavita

चल ना भाई फिर से बच्चे बन जाते हैं

गले में घुघुतिया की माला पहन

हर गली हर घर के चक्कर लगाते हैं।

कौओं तक से दोस्ती कर लें

वो दोस्ती का जमाना वापस लाते हैं।

लोगों को प्रकृति से कालजयी प्रेम में बांधते हैं।

उनको भी गले में डाल

ये गीत गुनगुनाते हैं।

गीत ?? कौन सा गीत ????

अरे

“Ghughutiya Geet”

Ghughutiya Geet: Hindi, Kumaoni Geet

Ghughutiya Geet is the traditional song which is for calling crows. Children sing it at the time when they are calling crows to have fest.

“काले कव्वे काले, घुगुती माला खा ले |

काले कव्वे आ, लगड़ बड़ा खा |

काले कौवा का का, पुसे रोटी माघै खा|

ले कव्वा बड़ो, मैं कें दे सुनाक घड़ो |

ले कव्वा ढाल, मैं कें दे सुनाक थाल |

ले कव्वा तलवार, मैं कें दे ठुलो घरबार |”

A Story On Ghughutiya: Uttarakhand Festival

Every festival in India has a story behind it that is associated with learning. Gughutiya: Uttarakhand Festival has its own story here it is.

हर पर्व की तरह घुघुतिया मनाने के पीछे भी एक कहानी है , जो हमारे प्रकृति, पशु प्रेम को दिखाती है।

ये कहानी है उस समय की जब कुमाऊं में चंदन वंश का शासन था।

राजा कल्याण चंद संतान प्राप्ति के लिए मन्नतें मांगते फिरते थे। इसी क्रम में वाघनाथ यानी बागेश्वर मन्दिर में मन्नत मांगने पर उन्हें सन्तान प्राप्ति हुई , जिसका नाम उन्होंने निर्भयचन्द रखा।

उसकी मां उसे प्यार से घुघुतिया पुकारती थी।

बेटे को खुश रखने के लिए उसकी मां ने उसको मोतियों की माला के साथ घुंघुरू भी पहना दिये।

घुंघुरू की की आवाज सुनके घुघुतिया काफी खुश होता था ।

 

” पर बच्चे शरारत न करें तो उनका बचपन अधूरा और

उनकी शरारत से मां परेशान न हो तो ममता अधूरी ।”

 

घुघुतिया को शरारत से रोकने के मां कहती थी कौवे आयेंगे और तेरी माला ले जायेगा और गीत गाती थी ।

“काले कव्वे काले, घुगुती माला खा ले |

काले कव्वे आ, लगड़ बड़ा खा |

काले कौवा का का, पुसे रोटी माघै खा|

ले कव्वा बड़ो, मैं कें दे सुनाक घड़ो |

ले कव्वा ढाल, मैं कें दे सुनाक थाल |

ले कव्वा तलवार, मैं कें दे ठुलो घरबार |”

 

कुछ ऐसा संयोग हुआ कि कौवे ये गीत सुनकर मां , बेटे के पास आने लगे ,

मां भी अपने बेटे के हाथ से उन्हें कुछ खाने को देती ।

अब घुघुती का डर खत्म और कौओं से दोस्ती शुरू।

 

पर हर कहानी में विलन होता है

इसमें भी है “मंत्रीगण”

 

जो इस आस में थे की

निसंतान राजा की कोई औलाद नहीं तो राजपाट अब उनका होगा

पर घुघुतिया के जन्म ने उनके सापनो में पानी फेर दिया,

 

तो उन्होंने घुघुतिया को मारने की साज़िश की

इस क्रम में वो घुघुतिया को उठाकर जंगल की तरफ ले गये

 

” हर कहानी में कमजोर को बचाने के लिए एक हीरो आता है इस में भी हीरो आते।

पर इस बार हीरो थे कौवे।”

 

कौओं ने ढिसुम- ढिसुम फाइट की

चोंच से वार किया।

एक कौआ घुघुतिया की माला झपट कर महल की ओर ले गया

और चिल्लाने लगा

लोग-बाग इक्कठा हुए ।

रानी ने माला पहचान ली ।

 

कौआ एक डाल से दुसरी डाल उड़ने लगा।

राजा के आदेश पर सेना ने उसका पीछा किया और

जा पहुंचे घुघुतिया के पास जो एक पेड़ के नीचे था।

 

सैनिकों ने मंत्रियों को पकड़ लिया।

राजा ने मंत्रियों को दण्ड दिया ।

ये पूरी कहानी कुमाऊं में आग की तरह फ़ैल गई।

तब से घुघुतिया कौओं के सम्मान में मनाया जाता है

 

“देखा है कभी ऐसा अनोखा प्रकृति प्रेम”

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