Daali Daali Phoolon Ki: A Hindi Poem

A Hindi poem Mat sun re musafir in daali daali phoolon ki, “मत सुन रे मुसाफ़िर इन डाली- डाली फुलों की” tells about the anger of Pahad on some tourists who behave irresponsible and destroy the tranquility, serenity, beauty of Pahad. May be Pahad is garbage for them but it is home of us. Watch The Video Here.

Mat sun re musafir in daali daali phoolon ki:

A Hindi Kavita which is inspried by Uttarakhand tourism song Daali Daali phoon ki for boosting tourism in the state. But the kavita Mat sun re musafir in daali daali phoolon ki, is serving completely opposite purpose. Why? You will understand the reasons as you complete reading this Hindi Kavita.

मत सुन रे मुसाफ़िर

इन डाली- डाली फुलों की

मत सुन रे मुसाफ़िर

इन डाली- डाली फुलों की

जो तुझको बुलाते हैं

मुझ पहाड़ में ।

क्योंकि गन्दगी मिटती नहीं मिटाने से

जो छोड़ जाते हो तुम मुझ पहाड़ में।

 

सुन रे मुसाफ़िर

तेरा बहुत सा सामान मेरे पास पड़ा है ,

वो प्लास्टिक की थैलियां, वो पेप्सी की बोतले ,

वो बीयर के कैन्स , वो चिप्स के रैपर, वो एपी फिज्ज ।

 

सब कुछ सम्भाल रखा है मैंने

सड़क के किनारे नदियों में बिछा रखा था तुने।

सम्भाल रखा है मैंने

 

इस इंतजार में कि

वापस कब आओगे कभी

इन्हें भी अपने साथ ले जाओगे कभी

अपने घर में इकट्ठा करोगे

और अपना एक पहाड़ बनाओगे कभी।

 

तुम कहो तो

भिजवा दूं इन्हें ,

नदियों के रास्ते पहुंचा दूं इन्हें

देर लगेगी पर पहुंचेगा जरूर ,

पहाड़ से तुम्हारे घर का पता भी तो काफी दूर।

 

तो सुन ले मुसाफ़िर,

अगर अचानक घर में पानी आना बन्द हो जाए,

नदियों का जल स्तर कम हो जाए ,

कचरे की बाढ़ आजाए ,

पानी कुछ दुषित नजर आये

 

या बिमारियां

बार-बार तुम्हारे दरवाजे पर दस्तक दे जाए।

 

तो समझ लेना,

समझ लेना कि तुमहारा सामान तुम्हारा पता ढुंढ रहा है।

 

तो  मत सुन रे मुसाफ़िर

इन डाली- डाली फुलों की

जो तुझको बुलाते हैं मुझ पहाड़ में ।

 

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