Change Hindi Poem

Change Hindi Poem | पता नहीं कब |

Change Hindi Poem | पता नहीं कब | We know change is inevitable. No matter how far we run, it will catch us. Some change is good but some are not.

Sometimes the hard times reflect on face and attitude. This type of change creates bitterness in relation as well as in life. After college life changes but not equally for everyone. It reflects on this short Hindi poem.

Hindi poems

 

Change Hindi Poem | पता नहीं कब |

PahadNama

 

समझदारी का ये चोला, पता नहीं कब औढ़ लिया

गंभीरता ने चेहरे की मासुमियत छिन्नकर,

खुशियों से, पता नहीं कब मुँह मोड़ लिया

 

अभी तो बैठे थे सब दोस्त मिलकर,

बेफिक्री का आलम, पता नहीं कब तोड़ लिया।

 

कभी रुकते नहीं थे पैर हॉस्टल के एक कमरे में,

ऑफिस के एक केबिन में, पता नहीं कब खुद को बांध लिया।

 

धधकती उस उमंग से भरी अग्नि में,

निराशा के बाँध से , पता नहीं हमने पानी कब छोड़ लिया।

 

Aansu Hindi poem:

अब matured हो गये है दर्द के आंसू

बड़े से बड़ा दर्द बिन बहे झेल लेते हैं।

नादान तो ये खुशी के आंसु है

बिन बात ही लुढ़क आते हैं।

सुकुन दे कुछ आंसू ऐसे भी होते हैं।

जो किसी शान्त जगह में ही बिछड़ने को मिलते हैं।

 

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