Because I don’t Lose: क्योंकि मैं हार नहीं मानता

मैं हार नहीं मानता। क्योंकि कभी किसी ने सिखाया ही नहीं । न लोगों ने, न किताबों ने, न मोटिवेशनल स्पीकर्स ने, और नहीं कभी मेरे बाप- दादाओं ने। तो भला मैं अपने बच्चों को कैसे सिखाता।

सुना है। इस ऐटिटूड से लोगों ने बहुत कुछ पाया है। एग्जाम में अच्छे मार्क्स, सरकारी नौकरी, पैसा, और न जाने क्या – क्या ? सही तो सुना है। मेरे बाप दादाओं की फोटोज पे अलग सी मुस्कान रहती है। घमंड की बात नहीं पर ज़रा दीवार पे टंगे मेरे बाप, परदादा, दादा, और मेरी फोटो तो देखिये। मूछों पे ताव दिए कितने खूबसूरत लग रहे हैं। सच में “वाह”। और मजे की बात है कि मेरे बच्चे भी इसी राह पे निकल पड़े हैं “कभी न हार मानना”। ऐसे ही नहीं बचपन से अब तक दोनों टॉपपर रहे हैं। गर्व है मुझे उनपर और शायद उन्हें भी गर्व हो अपने बाप दादाओं और उनकी सीख पर।

पर एक बात का अफ़सोस हमेशा रहेगा कि मैं उन्हें गर्व और ईगो के बीच की वो पतली लाइन नहीं समझा पाया। वैसे तो ये लाइन इतनी पतली होती है कि आसानी से दिखती नहीं और कोई दूसरा तो समझा नहीं सकता खुद ही समझनी पड़ती है। पर फिर भी एक कसक तो रह ही जाती है।

मैं अपनी पूरी जिंदगी काम के सिलसिले में, घर से बाहर रहा। ऐसी – ऐसी जगहों पे जहाँ परिवार का अहसास भी आने से पहले सौ बार सोचे। अगर कभी किसी तरह आ गया तो वो अहसास कील जैसा चुबता है पर मैं फिर भी वो दर्द सहके अपना काम करता रहता था क्योंकि मैं हार नहीं मानता। सोचता था रिटायरमेंट के बाद खूब खेलूंगा बच्चों के साथ खूब भोगूँगा परिवार सुख।

सालभर में दस दिनों के लिए आता हूँ घर। बच्चे खूब लिपटे रहते हैं। बस पापा पापा करते रहते हैं। आह शायद सबसे लकी इंसान हूँ मैं इस दुनिया में। लालच तो बढ़ता जाता है घर में रुकने का पर उन्ही के लिए ही तो पैसे कमाने जा रहा हूँ। दिल हार मानके और कुछ दिन रुकने को कहता है। पर क्योंकि मैं हार नहीं मानता। दिल की न सुनकर बैग पैक करता हूँ और अपने कर्मस्थल लौट जाता हूँ दस दिन की इन यादों की कमाई करके। एक साल पड़ा है वापस जाने को तो सम्भल कर खर्च करता हूँ हर याद के पल। न ज्यादा न कम।

पर जैसे जैसे उम्र बढ़ी मैं थोड़ा और लालची हो गया। और यादों के एक्स्ट्रा कमाई के लिए घर निकल जाता हूँ। ये बढ़ती उम्र भी न। अकेलेपन का अहसास कुछ ज्यादा ही कराती है। पर अब बच्चे भी तो बड़े होरहे हैं। उनकी भी तो अपनी लाइफ है। उनके दोस्त, पड़े, खेल, कर्रिएर, और बहुत कुछ। तो अब मुझे वो सब नहीं मिलता है जिसके लिए मैं यहाँ आता हूँ। सोचके तो आता हूँ यादों की ऊपरी कमाई करूँगा लेकिन जितना पहले मिलता था उतना भी नहीं मिल रहा है। मेरे बच्चों की लाइफ से मैं हट रहा था क्योँकि उनकी भी तो लाइफ है पर मैं ये बात मानने को तैयार ही नहीं। मैंने भी उनकी प्राइवेसी में गुसपैठ करनी शुरू करदी। उनको दोस्तों के साथ जाने से रोकना। टीवी देखने से मना करना। कोई हॉबी फॉलो कर रहे हैं तो मना करना, उनको पैसे मांगने के लिए मजबूर करदेना, एक बार नहीं कई बार मांगे तब जाके रिस्पांस देना, मेरे बगैर ये घर नहीं चल सकता ये एहसान दिखाना,। ऐसा नहीं है की मैं उनका कोई दुशमन हूँ लेकिन उनके साथ ज्यादा समय बिताने की ज़िद्द ने मुझे उनका दुश्मन बना दिया। मैं बस किसी भी हालत में चाहता था जीतना। क्योंकि मैं कभी हार नहीं मानता।

मैं चाहता था कि मेरे बच्चे और पत्नी मेरी ये परेशानी समझे मेरे बिना कुछ कहे। मैं खुद नहीं कह सकता था क्योंकि मुझे कमज़ोर नहीं दिखना था या मुझे खुद ही उस समय पता नहीं था। मैं और भी इंटरफेर करने लगा उनके कामों में। पर मुझे वो पहली जैसी अटेंशन नहीं मिल रही थी। अब मेरी वजह से घर का माहौल बिगड़ रहा था। रोज़ मैं चिल्लाने लगा। मेरी पत्नी और बच्चे मुझसे नज़र चुराने लगे। उन्होंने मुझसे पैसे की बात करनी भी छोड़ दी एक मात्र वजह जिससे मैं उनसे बात कर सकता था। वो खुद ही टूशन पढ़ाके अपना खर्च निकालने लगे। अब मेरे पास क्या उपाय था।

क्योंकि मैं हार नहीं मानता तो मैंने बीमार होने का बहाना शुरू किया। ये काम कर रहा था। मुझे अच्छे से पूछ रहे थे घर वाले। मैंने भी नाटक जारी रखने का विचार कर लिया। पर डॉक्टर के पास जाते ही सब दूध का दूध और पानी का पानी हो गया। पर मैंने भी नाटक जारी रखा। अब कोई भी मेरी बातों का यकीन नहीं कर रहा है। मैं सच में बीमार हूँ पर कितने ज़िद्दी हैं ये लोग मानते नहीं। मेरा खाना पीना छूट गया। सोचा की अब तो हार मान ही लेंगे ये लोग। पर मैंने उन्हें कहते हुए सुना हमे पता नहीं क्या करने की सोच रहे हो। नाटक है सब जब भूख लगेगी तो हारके खुद ही उठके खाएंग। हार और मैं। क्योंकि मैं कभी…………….

आज मेरी तेरवी है। मातम है घर में। मैं जिस भी जगह हूँ वहां से रो रहा हूँ। ये बहुत अच्छी जगह है मेरे घमंड के लिए। यहाँ मुझे किसी का दर नहीं की कोई मुझे कमजोर पड़ते हुए देखे। पर एक बात कहना चाहता हूँ यहाँ से अपने बच्चो और पत्नी को की मुझे माफ़ करदेना। और रिश्तों में अक्सर हार मानने से रिश्ते जीत जाते हैं।

 

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