A Story Of Half India: पुरानी-यादें

 

घरों की यादों का मलहम,

आधा हिन्दुस्तान अपने दिलों के जख्मों पर लगाए घुमता है।

पिता की डांट, माँ का दुलार, बहन का खिजाना, भाई पर रोब,

रह- रह कर याद आता है।

पुराने किस्सो की याद,

अपने पीछे भागने को हमे लुभाता है।

फिर बेचारा बोलके हमे खूब चिढ़ाता है।

दोस्तों का साथ, अपनी कुछ अलग दास्ताँ कहता है,

पहला प्यार हो या कोई शरारत, हर किस्सा खास होता है।

अरे गिरे फल उठाके कौन खाता  है,

पेड़ों से फल तोड़कर खाने का मजा,

कहाँ इन जूस की दुकानों में भाता है।

सपने पूरा करने की चाह,

हमे शहर में  खिंच तो ले आता  है।

पर बहुत कुछ छीन भी ले जाता  है।

सुविद्या है पर सुख नहीं, भोग है पर आराम नहीं,

नींद है पर चैन नहीं, सूनापन है पर शांति नहीं,

तभी तो इन बड़े शहरों में रहकर भी मेरा गाँव मुझमें इतराता है।

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