Ghar Ki Yaadon Ka Malham: A Hindi Poem

Ghar Ki Yaadon Ka Malham, A Hindi poem is true for all the people living far from their village, home, parents, and children just for earning money. Almost half India is facing the situation. They have left with memories only after they come from their work. Here Hindi kavita tried to portray in words, hope you appreciate that. The thought came in my mind when I was listening Yaadon Ka Idiot Box by Neelesh Misra after coming from office. To watch the video, click here.

Ghar Ki Yaadon Ka Malham: A Hindi Poem

 

घर की यादों का मलहम,

आधा हिन्दुस्तान

अपने दिलों के जख्मों पर लगाए घुमता है।

 

पिता की डांट, माँ का दुलार,

बहन का खिजाना, भाई पर रोब,

रह- रह कर याद आता है।

 

पुराने किस्सो की याद,

अपने पीछे भागने को हमे लुभाता है।

फिर बेचारा बोलके हमे खूब चिढ़ाता है।

 

घर की यादों का मलहम,

आधा हिन्दुस्तान

अपने दिलों के जख्मों पर लगाए घुमता है।

 

दोस्तों का साथ,

अपनी कुछ अलग दास्ताँ कहता है,

पहला प्यार हो या कोई शरारत,

हर किस्सा खास होता है।

 

घर की यादों का मलहम,

आधा हिन्दुस्तान

अपने दिलों के जख्मों पर लगाए घुमता है।

 

अरे गिरे फल उठाके कौन खाता  है,

पेड़ों से फल तोड़कर खाने का मजा,

कहाँ इन जूस की दुकानों में भाता है।

 

घर की यादों का मलहम,

आधा हिन्दुस्तान

अपने दिलों के जख्मों पर लगाए घुमता है।

 

सपने पूरा करने की चाह,

हमे शहर में  खिंच तो ले आता  है।

पर बहुत कुछ हमसे वो छीन भी ले जाता  है।

 

घर की यादों का मलहम,

आधा हिन्दुस्तान

अपने दिलों के जख्मों पर लगाए घुमता है।

 

हाँ सुविधा है पर सुख नहीं,

भोग है पर आराम नहीं,

नींद है पर चैन नहीं,

सूनापन है पर शांति नहीं,

तभी तो इन बड़े शहरों में रहकर भी

मेरा गाँव मुझमें इतराता है।

 

घर की यादों का मलहम,

आधा हिन्दुस्तान

अपने दिलों के जख्मों पर लगाए घुमता है।

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