नर को अपना सहचर है माना

 

 

नभ-तरु-सरोवर-भूधर,
सब है नर के सहचर
है ये सब कुदरत के दिए,
मानव के हर्ष के लिए

परंतु प्रकृति थी बेचारी भोली,
जो मनुष्य ने माँगा दे डाली
न जान पायी इंसान को,
न उसके ह्रदय के लंकेश को

पेड़-वन-पशु-पक्षी,
सबको मानव ने दिया है कष्ट,
केवल अपने आनंद के लिए,
कुदरत को दिया है दर्द

फिर भी प्रकृति ने माना,
इंसान को अपना सहचर
हजारों दर्द के बाद भी,
मानव को दिया है हर्ष

कहकर उसको माँ,
उसे जहर पिलाया,
फिर भी उसने कभी,
अँगूठा नहीं दिखाया

कुदरत है ऐसी मुर्ख,
जैसा मैं बनना चाहु,
सबकुछ छिन जाने पर भी,
नर को अपना सहचर

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