दो भिखारी | Hindi Story

दो भिखारी | Hindi Story is narrated by Bhumika Joshi in Kagaj Kalam.  She has come up with another good read. Your appreciation is very helpful to nourish her creativity. 

Hindi Poems By Kagaj Kalam.

दो भिखारी | Hindi Story

एक बार की बात है। दो भिखारी थे एक का नाम रघु और दूसरे का नाम नंदन था। रघु को लिखना पढ़ना नहीं आता था परंतु नंदन को लिखना पढ़ना दोनों आता था। परंतु दोनों ही बचपन से अपंग थे।

नंदन हर समय भगवान को कोसता नंदन को पढ़ने लिखने का शौक भी था पर वह अपनी अपंगता को अपनी कमज़ोरी समझता था। नंदन कहता आजकल लोग कितने लालची हो गए हम गरीबों को एक ₹2 देने से भी कतराते हैं। रघु कहता है इसमें तुम भगवान को या किसी इंसान को दोष मत दो क्योंकि आजकल कई लोग अपंग होने का नाटक करते हैं और भीख मांगते हैं।

क्या कसूर: दो भिखारी | Hindi Story

नंदन कहता है तो इसमें हमारा क्या कसूर है हम क्यों इस में पिस रहे हैं? हम तो सही में अपंग हैं इन लोगों को क्या पता दो वक्त का खाना जुटाना कितना मुश्किल होता है। रघु कहता है मैं तुम्हारी बात से सहमत हूं परंतु हम भी तो अपने आप को कमज़ोर साबित कर रहे हैं भीख मांग कर। नंदन कहता है कि तुम क्या बोल रहे हो, हम कुछ कर ही नहीं सकते यह हमारे पिछले जन्मों के कर्मों का फल है, जो हम इस जन्म में भुगत रहे हैं। इतना कहकर नंदन सो जाता है नंदन की बातें रघु को पूरी रात भर सोने नहीं देती।

रघु और नंदन

रघु पूरी रात भर यही सोचता रहता है  कि क्या हम मेहनत कर नहीं सकते ।अगर हम अपंग हैं तो क्या हम कोई काम नहीं कर सकते। रघु कहता है अब नंदन की बात को मुझे गलत साबित करना है, सुबह हो जाती है नंदन भी उठ जाता है, और कहता है आज मेला लगने वाला है तो काफ़ी लोग आएंगे क्या पता आज हमको थोड़े ज़्यादा पैसे मिल जाएं। रघु कहता है हां हो सकता है। नंदन कहता है मैं आज यहां तुम्हारे साथ नहीं बैठूंगा क्योंकि यहां क्या पता दोनों में से किसी एक को मिले तो नंदन घिसटकर  दूसरी तरफ़ चल पड़ता है। अब रात हो जाती है नंदन रघु के पास आता है और कहता है आज तो मेरी अच्छी कमाई हुई इसमें मैं दो ब्रेड के पैकेट खरीद कर लाया और अभी मेरे पास ₹10 बचे हैं। नंदन रघु को देखता है और कहता है आज तुम खाना नहीं खा रहे हो क्या? रघु कहता है मैं आज पैसे खर्च नहीं करूंगा मैं अपने पैसे बचाना चाहता हूं। नंदन कहता है तुम्हारा दिमाग ख़राब हो रखा है हमको भीख अपनी भूख मिटाने के लिए मिलती है ना कि पैसे बचाने के लिए। इतना कहकर रघु और ‌नंदन दोनों सो जाते हैं अब एक महीना बीत जाता है नंदन काफ़ी ख़ुश था क्योंकि उसको दोनों समय का खाना नसीब हो रहा था। नंदन कहता है रघु तुम तो भरपेट खाना भी नहीं खाते फिर भी इतनी खुशी क्यों है तुम्हारे चेहरे पर‌? रघु रहता है क्योंकि अब मैंने ₹500 जमा कर लिए नंदन कहता है क्या बात भाई इतने पैसों का करना क्या है? रघु कहता है अभी रुको तुम रघु दुकान वाले को अपने पास बुलाता है और कहता है तुम मुझे सफ़ेद बड़े कागज़ दो और रंग भी दो दुकान वाला रघु को सब दे देता है। नंदन कहता है तुमने इसमें अपने पैसे क्यों लगाए रघु कहता है अब मैं चित्रकारी करूंगा। नंदन ये सुनकर हंस पड़ता है और कहता है तुझे पैसे बर्बाद करने है तो तू कर मैं तो दूसरे मोहल्ले में ही रहूंगा वहां अमीर लोग ज़्यादा आते हैं इतना कहकर वह वहां से चले जाता है।

नया रास्ता

अब रघु चित्र बनाने लग जाता है, वह दिन भर चित्र बनाता है अब वह लोगों से भी भीख नहीं मांगता जिसका मन होता है वह अपने आप दे देता है। अब एक हफ़्ता गुज़र गया रघु ने काफ़ी चित्र बनाएं मेले वाले दिन उसने वह चित्र के एकदम अच्छे से रखें जिससे लोग देखें और खरीदें लोगों ने रघु की चित्रकारी देखी पर खरीदी नहीं जिसे रघु निराश हो गया।

अगले दिन एक आदमी आया और रघु से बोला क्या यह चित्र तुमने बनाए हैं रघु बोलता है जी साहब क्या आपको इनमें से कोई खरीदना है।

वो आदमी नहीं कहता है और वहां से चला जाता है रघु अब और भी निराश हो जाता है वह सोचता है क्या मैंने अपने पैसे इस पर लगा कर कोई गलती तो नहीं कर दी।

अगले महीने वही आदमी दोबारा आता है और रघु को कहता है क्या तुम कार्टून एवं अन्य चित्र भी बना सकते हो, रघु कहता है जी जरूर। तभी आदमी कहता है तो ठीक है मैं तुम्हें एक चित्रकारी की नौकरी देना चाहता हूं जिसमें तुम महीने में 20 हज़ार कमा सकते हो। रघु बहुत ख़ुश होता है वह उस आदमी को शुक्रिया कहते-कहते थकता नहीं वह आदमी कहता है इसमें मुझे शुक्रिया कहने की क्या ज़रूरत है यह तो तुम्हारी मेहनत है, तुम अपंग होते हुए भी इतना सब कुछ करने की हिम्मत रखते हो तो मैंने तो बस तुम्हें पहचाना है।

इतना कहकर वह आदमी रघु को लेकर चले जाता है अब रघु उस आदमी के लिए चित्रकारी करता था और पैसे भी कमाता था। रघु ‌की  जिंदगी अब काफ़ी अच्छी चल रही थी उसने 1 साल में अपने लिए एक छोटा सा घर भी खरीद लिया था ।

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और एक दिन

2 साल बाद वह अचानक नंदन से मिलता है उसे पहचान नहीं पाता पर रघु कहता है तुम मुझे भूल गए नंदन कहता है आप कौन हैं? वो कहता है मैं रघु हूं । नंदन एकदम चौक जाता है और कहता है तुम इतना कैसे बदल गए। रघु कहता है जिस रात तुम ने वो कर्मों वाली ‌बात कहीं थीं ना उसी दिन मैंने सोच लिया था कि तुम को गलत साबित करना है कि हम कमज़ोर नहीं है।

 रघु कहता है मैं बेशक चल नहीं सकता पर मेरे हाथ तो सही है ना तो मैं चित्रकारी कर सकता हूं तो मैंने वही किया। रघु कहता है मित्र परेशानियां किसके साथ नहीं है पर उनसे निकलने की हिम्मत भी होनी चाहिए ।नंदन कहता है मित्र तुम्हारा बहुत बड़ा उपकार होगा अगर तुम मुझे भी अपने आप को साबित करने का एक मौका दो रघु कहता है मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूं। नंदन कहता है मैं अपनी अपंगता को भूल कर तुम्हारी तरह कुछ काम करना चाहता हूं तो मुझे कुछ काम दो।

रघु कहता है अच्छा ठीक है कल मेरे बड़े साहब को मैं तुम्हारे पास लेकर आऊंगा तो तुम कुछ कविताएं लिख कर रखना क्योंकि उनको एक कवि की जरूरत है अगर तुम्हारी कविताएं उन्हें पसंद आई तो तुम्हारी नौकरी लग सकती है।

यह बात सुनकर नंदन कविताएं लिखने लग जाता है। नंदन को पढ़ना लिखना आता था जिस वजह से वह अच्छी अच्छी कविताएं लिख पाया और उसे एक अच्छी नौकरी मिल पाई।

 

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