ज़िम्मेदारी

    ज़िम्मेदारी , one of the Hindi stories by Bhumika Joshi

  ज़िम्मेदारी: A Hindi Story

नवीन नाम का एक दर्जी था, जो काफ़ी मेहनती था उसके बनाएं कपड़े दूसरे मोहल्ले में भी प्रचलित थे। नवीन कपड़े बनाता भी था तथा उन पर डिजाइनिंग का काम भी करता था और इसी कारण की वजह से हर कोई उससे कपड़े बनवाना चाहता था। वह अपने कार्य में सबसे उत्तीर्ण था। उसके पास बाकी दर्जी भी आते काम सीखने और वह उनको भी बताता कि अच्छा कपड़ा कैसे बनाया जाता है नवीन कभी भी दूसरों को ज्ञान बांटने में घबराता नहीं था।

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एक बार शाम के समय नवीन अपने मित्र नरेंद्र से मिलने चला गया। वह जब नरेंद्र की दुकान में पहुंचा तो कहता है क्या दरवाजे बनाए हैं तुमने मित्र। नरेंद्र कहता है अरे शुक्रिया मित्र तुम्हारा आओ तुम बैठो मैं तुम्हारे लिए चाय मंगवा ता हूं। नवीन कहता है बिल्कुल वह कहता है धंधा पानी और भाभी सब कैसे हैं? नरेंद्र कहता है काम तो मेरा सही है और पूजा भी अच्छी है। और तुम बताओ तुम्हारा कैसा चल रहा है?? नवीन कहता है बस भाई मेरा भी बढ़िया चल रहा है। नरेंद्र मज़ाक करते हुए कहता हैं तेरी शादी हुई कि नहीं अभी तक नवीन हंस के कहते हैं ना भाई अभी कहां। उसी समय दुकान पर ग्राहक आता है और कहता है नरेंद्र भाई मैं नया घर बनवा रहा हूं तो दरवाज़े बनाने का काम पूरा आपका है। वह कहता है क्यों नहीं ज़रूर। उसके बाद एक और आदमी आता है और नरेंद्र को ₹5000 देकर जाता है। नवीन नरेंद्र से पूछता है इसने तुम्हें ऐसी पैसे क्यों दिए? नरेंद्र कहता है 2 महीने पहले इन्होंने मेरे से अपने घर के लिए दरवाज़े बनवाए थे तो उसी के पैसे देने आए हैं। नवीन कहता है अच्छा तुम्हारे काम में उधार चलता है मतलब। अब दोनों ही अपने बचपन की बातें शैतानियां सब याद कर रहे होते हैं और खूब बातें करने के बाद नवीन कहता है अब मुझे चलना चाहिए नरेंद्र कहता है हां मैं भी निकलता हूं घर के लिए ।

अगले दिन नवीन अपनी दुकान पर बैठकर कपड़े बना रहा होता है और तब उसे नरेंद्र की याद आती है और वह कल की तरह अपना काम निपटा कर नरेंद्र की दुकान में पहुंचता है। नरेंद्र उसका स्वागत करता है पर कुछ समय बाद नरेंद्र व्यस्त हो जाता है तब नवीन नरेंद्र को काम करते हुए देखता है और कहता है मित्र तुम्हारा काम कितना सही है इतने से काम के काश मुझे भी इतने पैसे मिलते । नरेंद्र कहता है मैं तुम्हारी बात समझा नहीं। वो कहता है अरे देखो मित्र तुम् मुझे गलत मत समझना पर तुम्हारा काम  काफ़ी आसान  है, मतलब मुझे तो अपनी दुकान में किसी से बात करने का समय ही नहीं है और तुम कितने आराम से काम करते-करते मेरे से बात कर पा रहे हो और सबसे बड़ी बात कि तुमको लकड़ियों पर कलाकारी के इतने पैसे मिलते हैं। तुम्हारे इस काम के लिए तुम काफ़ी प्रचलित हो हर कोई अपने घर के लिए लकड़ी का सामान तुमसे ही बनवाता है। तब नरेंद्र कहता है मित्र तुम्हारे कपड़े का काम मेरे मोहल्ले तक प्रसिद्ध है तुम्हारे पास भी तो दूर-दूर से लोग कपड़े बनवाने आते हैं। वह कहता है परंतु तुम्हारे जितने पैसे नहीं मिलते मुझे एक बात है मुझे मेरी मेहनत के हिसाब से पैसे मिलते हैं और तुम्हें तुम्हारी मेहनत से ज़्यादा पैसे मिलते हैं। नरेंद्र कहता है नहीं मुझे मेरी मेहनत के ही पैसे मिलते  हैं। वह कहता है मेहनत तो है पर फ़ालतू पैसा भी है इतने आसान काम के लिए इतने पैसे क्यों? मुझे तो सही में लगता है तुम्हें फालतू का पैसा ही मिल रहा है। नरेंद्र कहता है अरे मित्र हर कोई अपने काम में प्रसिद्ध और उत्तीर्ण होता है जिस तरह तुम हो उसी तरह मैं हूं। वह कहता है नहीं मित्र। नरेंद्र कहता है अच्छा मतलब तुम मेरी बात से सहमत नहीं हो। वह कहता है बिल्कुल नहीं। तब नरेंद्र कहता है अच्छा चलो एक काम करते हैं तुम मेरी दुकान पर 1 महीने तक काम करना और जितना पैसा तुम कमा पाए  वह सब तुम्हारा होगा और जितना पैसा मैं तुम्हारी दुकान पर कमा पाऊंगा वह मेरा होगा। वह कहता है अपनी बात से पलटना मत नरेंद्र और मैं इस काम के लिए बिल्कुल तैयार हूं तुम्हारा और मेरा काम काफ़ी मिलता-जुलता है तुम दरवाज़े पर कलाकारी दिखाते हो और मैं कपड़ों पर। नरेंद्र कहता है पर मैं सारा काम स्वयं करता हूं मतलब लकड़ी काटने से लेकर दरवाज़े बनाने और डिजाइनिंग तक। तब नवीन कहता  है अरे भाई मैं भी अपना काम स्वयं ही करता हूं। नरेंद्र घर जाकर अपनी बीवी पूजा को सब बात बताता है और कहता है एक महीना मेरी दुकान पर नवीन बैठेगा तो उसे जैसा जो करना है वैसे करने देना पूजा कहती है ठीक है जी।

अब नवीन नरेंद्र की दुकान पर बैठता है और दरवाज़े बनाने का काम शुरू करता है । वह मन ही मन खुश था तभी एक आदमी आता है और कहता है भाई अपने मालिक नरेंद्र को बुलाना ज़रा। नवीन कहता है अरे भाई साहब यह दुकान एक महीने तक मेरी है और नरेंद्र मेरी दुकान में बैठा है तब वह आदमी कहता है मुझे तो दरवाज़े और कुर्सी बनवानी थी । नवीन कहता है तो मैं किस लिए हूं मैं बनाऊंगा। आदमी कहता है तुम बनाओगे,  हां मैं बनाऊंगा कोई शक। चलो ठीक है बना तो देना पर अच्छा बनाना नरेंद्र की तरह वह कहता है अरे नरेंद्र से भी बढ़िया बनेगा आदमी कहता है देखते हैं चलो। अब वह काम पर लग जाता है वह देखता है लकड़ी नई चीजें बनाने के लिए कम पड़ रही थी तब वह लकड़ी लेने जाता है और लकड़ी काटने के बाद अपना काम दोबारा शुरू कर देता है। आधा महीना बीत गया नवीन से ग्राहक खुश थे और नवीन की कमाई भी अच्छी हो रही थी। अब नवीन को दोबारा लकड़ी की जरूरत पड़ी फिर वह लकड़ी लेने जाता है और वह क्या देखता है कि लकड़ी के लिए पेड़ बचे ही नहीं वह सारी जगह  देखता है पर कहीं पेड़ नहीं थे। तब उसे मन मारकर लकड़ी खरीदकर लानी पड़ती है और वह जैसे तैसे अपना काम पूरा करता है।

एक महीना ख़त्म हो जाता है नरेंद्र नवीन दोनों मिलते हैं और नवीन देखता है कि नरेंद्र ने उतने पैसे कमाए जितने वह कमाया करता था अपनी दुकान में बैठकर। परंतु नवीन इतने पैसे नहीं कमा पाया जितना नरेंद्र कमा पाता था अपनी दुकान पर बैठकर। तब वह गुस्से से नरेंद्र से कहता है यह सब तुमने किया है ना। वह कहता है भाई देख तेरे पैसे लकड़ी खरीदने में बर्बाद हुए और मैंने आज तक लकड़ी नहीं खरीदी। नवीन कहता है यह सब तेरा षड्यंत्र था, मैं लकड़ी खरीदूं और अपने पैसे बर्बाद करूं यही चाहता था तू। नरेंद्र कहता है क्या बोल रहे हो मित्र ऐसा कुछ नहीं है परंतु मैं जहां से भी लकड़ी लाता हूं ना वहां उसके दुगने पेड़ लगा कर आता हूं और फिर उनकी देखभाल भी करता हूं और मैंने आज तक हर एक छोटी सी छोटी लकड़ी का भी दुरुपयोग नहीं किया। जिस वजह से मुझे लकड़ी की कमी कभी हुई ही नहीं।

नवीन कहता है कि पेड़ उगाने में काफ़ी समय लगता है मुझे उल्लू मत बनाओ। नरेंद्र कहता है भाई उल्लू नहीं बना रहा हूं मुझे पता है मैं काफी अलग-अलग जगहों से पेड़ लाता हूं और उनके दुगने लगाता हूं। नवीन कहता है चल झूठा। नरेंद्र कहता है नहीं भाई तू मान या ना मान मैं अपने काम के लिए प्रकृति के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकता  इसलिए मेरा तो यह नियम है जितने पेड़ काटो उससे ज्यादा पेड़ लगाओ और देखभाल भी करो। और पेड़ों को लगाना सिर्फ़ मेरी ज़िम्मेदारी नहीं है बल्कि हर इंसान की है क्योंकि भाई हर कोई सांस तो ले रहा है ना जब हम प्रकृति का सम्मान करेंगे तभी तो प्रकृति हमको जीवित रखेगी।

 

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