औरत | Woman | A Hindi Story |

औरत को सर का ताज कहते हैं पर क्या सही में हम उसको ताज की तरह रखते हैं। एक औरत का जिस चीज़ पर जितना हक है क्या कभी हम उसको उसका हक दे पाए हैं। बचपन से ही एक सोच हमारे दिमाग में डाल दी जाती है कि एक लड़का एक लड़की से ताकतवर होता है वह यह काम कर सकता है यह काम लड़की नहीं कर सकती है। और अगर हम लड़कियों की शिक्षा की बात करें तो आज भी गांव में लोगों को लड़कियों के शिक्षा एक बोझ लगती है, उन्हें लगता है लड़की तो पराया धन है जिसके ऊपर हम कितना भी पैसा लगा ले एक ना एक दिन उसे दूसरे घर जाना है। कुछ मां-बाप अपनी बेटी को पढ़ाते तो है पर यह बोलते हैं कि तुम यह बन सकती हो यह नहीं बन सकती इसमें में ज्यादा पैसा लगेगा तुम्हारे ऊपर ज्यादा पैसा लगाकर फ़ायदा ही क्या है तुम्हें पढ़ना है पढ़ो पर कुछ ऐसा जिसमें तुम पर ज़्यादा पैसा ना लग सके।

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 औरत | Woman: Hindi Story

और हमारे घर में ना कुछ रिश्तेदार पढ़े लिखे भी होते हैं पर फिर भी वह यह कहते हैं कि लड़की चाहे पढ़ाई में अच्छी हो ना हो पर खाना बनाना उसे जरूर आना चाहिए क्योंकि शादी के बाद खाना तो उसे बनाना ही पड़ेगा ना  और चलो खाना ना भी बनाए पढ़ लिख गई फिर भी लड़कियों को ना सब कुछ आना चाहिए। और लड़कों के लिए कहते है कि उनके पास तो एक अच्छी सी नौकरी होनी चाहिए और सरकारी नौकरी हो तो बात ही क्या है। लड़कियों का क्या है अगर पढ़ाई में नहीं निकली तो शादी करके अपनी जिंदगी गुज़ार सकती है पर अगर लड़के को नौकरी नहीं मिली ना तो यह समाज कच्चा खा जाता हैं।

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आज की  लड़कियां

आज लड़कियां हर वह नौकरी करती है जो लड़के करते चाहे वह बिजनेस हो ,डॉक्टरी हो ,इंजीनियर हो ,वैज्ञानिक हो या फिर कुछ और।

आज की औरत चाहे चांद तक पहुंच चुकी है परंतु रात को घर से बाहर निकलने के लिए उसके साथ किसी न को भेजा ही जाता है फिर चाहे वह उसका छोटा भाई ही क्यों ना हो।‌ जब किसी के घर में लड़की पैदा होती है ना तो जैसे जैसे ना लड़की बड़ी होती रहती है ना माता-पिता को बस एक ही फिक्र सताती है कि मेरे बेटी के साथ कभी कुछ गलत ना हो जाए।

अलग-अलग सोच

जितनी हमनें सोच देखी ना सिर्फ़ यही सोच नहीं है बहुत सारी सोच है अलग-अलग सोच है।अब इन सारी सोचों का कारण कौन है? अब सोच हमारी ही तो इसका कारण भी हम ही है, जिसको हम बिना कुछ सोचे समझे आगे चलाते जा रहे हैं। आज के समय में औरत सुरक्षित नहीं है अब चाहे कितने भी दावे कर दें कितना भी बोले जब तक एक देश में रहने वाली हर एक औरत अपने आप को सुरक्षित महसूस न कर सके तब तक हम कैसे कह दें कि हमारे वहां सारी औरतें सुरक्षित है। लोग कहते हैं सोच बदलो। हां सही कहते हैं औरतों के प्रति हमें अपनी सोच बदलनी चाहिए परंतु कुछ लोग इतने ढीठ होते हैं जब तक उन्हें कानूनी तौर पर यह बोल दिया ना जाए ना तुम एक औरत के ऊपर हाथ नहीं उठा सकते तब तक वह सुनते ही नहीं है अपनी चलाते हैं अपनी ताकत का प्रदर्शन करते हैं। और सिर्फ़ कानून  बनाने से कुछ नहीं होता उस कानून का लागू होना बड़ी बात होती है हर इंसान उस कानून की इज्ज़त करें वह बड़ी बात होती है।

सहने का क्या मतलब

अब ऐसा नहीं है इसमें हर जगह आदमी की ही गलती होती है। मतलब अगर कोई औरत अपने पति से मार खाती है तो उसमें पति की गलती है कि वह उस पर हाथ उठा रहा है और पत्नी की गलती यह है कि वह उसको अपने ऊपर हाथ उठाने दे रही है। एक औरत का यह सब सहने का क्या मतलब है। और इसी बात पर कुछ औरतों की यह सोच होती है कि अगर हम अपने पति की बात नहीं सुनेंगे तो कौन करेगा हमारा , कौन उठाएगा हमारी सारी जिम्मेदारियां? तो क्या हम अपनी जिम्मेदारियां खुद से नहीं उठा सकते हमको मार खाना मंजूर है पर खुद से कुछ करना मंजूर नहीं है, पर क्यों? समाज का कहेगा बस ये ही न‌ । भई समाज का काम है कहना वह सिर्फ़ तुम्हारे लिए नहीं कहेंगे जो ऐसा करेगा उन सब के लिए कहेंगे पर एक बार अगर तुमने अपने दम पर कुछ करके दिखा दिया ना तो सब अपने आप ही चुप हो जाते हैं फिर कोई नहीं कहता। शुरुआत में लोग कहते हैं क्योंकि उनका काम है और तुम्हारा काम है उनकी बातें ना सुनना।

चुप क्यों रहते हैं

अब एक औरत पर हाथ उठाने वाली बात पर लोग यह भी कहते हैं कि उसको अपने अधिकारों के बारे में ज्ञात नहीं है ‌। तो जिन लोगों को पता है ना अधिकारों के बारे में वह  चुप क्यों रहते हैं ऐसा तो है नहीं कि हमारे समाज में किसी को भी अधिकारों के बारे में पता ही ना हो। और जहां तक हाथ उठाने की बात है तो यह तो स्वभाविक है कोई किसी को कैसे मार सकता है‌ फिर चाहे वो पति ही क्यों ना हो। जब तक एक औरत यह सोचेगी कि अकेले कुछ करना उसके बसका नहीं तब तक वह सब सहती रहेगी फिर चाहे उसको अपने अधिकारों के बारे में भी क्यों ना मालूम हो।

जिंदगी दोबारा खुद बना सकती हूं

अगर औरत यह सोचने लग जाए ना कि पति ने मुझे घर से बाहर निकाल दिया इसका मतलब यह नहीं कि मेरी जिंदगी खत्म हो गई मैं अपनी जिंदगी दोबारा खुद बना सकती हूं।तब उस पर इतनी हिम्मत आ जाएगी कि आगे आने वाली मुश्किलों से कभी घबराएगी नहीं।

सिर्फ शरीर में सांसो का चलना जिंदगी चलना नहीं होता  और अगर ऐसा ही होता तो पति से मार खाने में क्या बुराई है सांसे तो चली रही थी वहां भी, बस वहां  सर उठा कर तुम नहीं जी सकते, गलत को गलत नहीं कह सकते सही को सही नहीं कह सकते अपने फ़ैसले तुम खुद से नहीं ले सकते। अब ऐसी सांसों का फायदा क्या है? ना ही तुम्हारा भला हो रहा है और ना ही किसी और का। तो इससे अच्छा उन सांसो का इस्तेमाल करो अपनी जिंदगी जीने में। कम से कम इतनी तो हिम्मत रखो कि गलत को गलत कह सको और सही को सही और सिर्फ हिम्मत ही नहीं रखनी बुद्धि भी रखो कि क्या गलत है क्या सही है।

 

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